Atreya


Friday, December 10, 2010

                 सुनहरा करियर बेहतर सैलरी

 

 

 


सुनहरा करियर बेहतर सैलरी पेट्रोलियम की खपत और उपयोगिता से शायद ही कोई अनभिज्ञ हो। पेट्रोलियम क्षेत्र में नित नई-नई खोजें हो रही हैं और वैकल्पिक ईधन की तलाश में कई नए प्रयोग भी किए जा रहे हैं। अनवरत खोज का ही नतीजा है कि पहले लोग पेट्रोल, केरोसिन, एलपीजी और डीजल को ही जानते थे, लेकिन अब इस कडी में सीएनजी भी शामिल हो गई है। यही कारण है कि इस फील्ड में ट्रेंड प्रोफेशनल्स की काफी आवश्यकता महसूस की जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, आज अगर यूथ इससे संबंधित कोर्स कर लेते हैं, तो उनके सामने नौकरी की समस्या नहीं रहेगी।
 

कोर्स और योग्यता
इस क्षेत्र में सुनहरा भविष्य बनाना चाहते हैं तो आपके सामने कई तरह के कोर्स मौजूद हैं। आप चाहें तो रिजरवायर, रिफाइनरी और ऑयल ऐंड गैस में बीई और बीटेक कर सकते हैं। बीटेक के बाद संबंधित क्षेत्रों में एमटेक भी किया जा सकता है। इसके अलावा एमटेक डुअल डिग्री करने का भी विकल्प खुला है, जो पांच साल की डिग्री है और इसमें 10+2 पास आउट छात्रों को दाखिला मिल जाता है। देश के प्रमुख संस्थानों द्वारा प्रवेश परीक्षा आयोजित की जाती है, जिसमें उत्तीर्ण होने वालों को ही प्रवेश दिया जाता है। इसके साथ ही कुछ चुनिंदा संस्थान एमएससी कोर्स भी संचालित कर रहे हैं। आप चाहें तो ऑयल ऐंड गैस मैनेजमेंट से एमबीए भी कर सकते हैं। बीटेक और बीई में बारहवीं पास छात्र दाखिला ले सकते हैं।
 

बेसिक साइंस की समझ जरूरी
इस फील्ड में अपना भविष्य तलाश रहे युवाओं के लिए इसके कामकाज का तरीका समझना अधिक जरूरी होता है। इनका काम जमीन के अंदर तेल की खोज और खुदाई, नमूनों की जांच, क्रूड ऑयल को अलग-अलग करना, प्रोसेसिंग और प्रोडक्शन करना होता है। ये फील्ड मेकेनिकल माइनिंग और केमिकल इंजीनियरिंग का मिला-जुला रूप है। इसलिए बेसिक साइंस फिजिक्स, जियोलॉजी और केमिस्ट्री के छात्र इस फील्ड को करियर के रूप में अपना सकते हैं।
 

पद और कार्य
यह फील्ड कई शाखाओं में विभाजित है। स्टूडेंट्स अपनी रुचि और योग्यता के अनुरूप जिस भी शाखा को अपनाना चाहें, अपना सकते हैं। इसके प्रमुख क्षेत्र और पद निम्न हैं:
 
प्रोडक्शन इंजीनियर : प्रोडक्शन इंजीनियर तेल के कुंओं की खुदाई होने के बाद अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए ईधन को सतह तक लाने के बेहतर तरीके इजाद करने का काम करते हैं। अगर चाहें तो आप इस पद पर काम कर सकते हैं।
 
ऑयल वेल-लॉग एनालिस्ट : तेल के कुओं की खुदाई के दौरान कई मापों का ध्यान रखना, ऑयल फील्ड के नमूने लेना तथा नमूनों की जांच करना होता है।
 
ऑयल ड्रिलिंग इंजीनियर : इस क्षेत्र के जानकार तेल के नए कुंओं की खुदाई की योजना बनाने के साथ-साथ इस बात की भी स्ट्रेटजी बनाते हैं कि लागत कम से कम आए।
 
ऑयल फै सिलिटी इंजीनियर : जब ईधन सतह पर आ जाता है तो ऑयल फै सिलिटी इंजीनियर उसे अलग करके, उसकी प्रोसेसिंग तथा अन्य स्थानों पर पहुंचाने का काम करते हैं।
 

मांग की अपेक्षा उत्पादन कम
पेट्रोलियम के प्रोडक्शन में भारत काफी पीछे है, लेकिन पेट्रोलियम की खपत के मामले में ये विकसित देशों से टक्कर ले रहा है। देश में मुंबई हाई, कृष्णा-गोदावरी बेसिन और असम के कुछ हिस्सों से पर्याप्त मात्रा में तेल प्राप्त होता है। तेल की खपत की बात की जाए तो भारत विश्व के शीर्ष दस मुल्कों में शामिल है। एक अनुमान के अनुसार भारत में ये तकरीबन 2 मिलियन प्रति बैरल रोजाना के आसपास है। घरेलू मांग की पूर्ति के लिए भारत दुनिया के विभिन्न देशों से लगभग 60 फीसदी तेल का आयात करता है।
 

क्या पढना होगा
मुख्य रूप से अपस्ट्रीम एवं डाउन स्ट्रीम सेक्टर, पेट्रोलियम इंडस्ट्री की शाखाएं हैं। अपस्ट्रीम में ऑयल एवं प्राकृतिक गैस का दोहन किस तरह किया जाए, इसकी जानकारी स्टूडेंट्स को दी जाती है। जबकि डाउन स्ट्रीम सेक्टर में रिफाइनिंग, मार्केटिंग एवं वितरण क्षेत्र में कैंडिडेट्स को प्रशिक्षित किया जाता है। पेट्रोलियम इंजीनियरिंग के स्टूडेंट्स क ो भौतिकी ऐंड इंजीनियरिंग एवं जियोलॉजी के सिद्घांतों के माध्यम से डेवलपमेंट तथा प्रोसेसिंग और पेट्रोलियम रिकवरी के बारे में बताया जाता है। इसके साथ ही मैकेनिक्स, ड्रिलिंग, पर्यावरण संरक्षण जैसे सब्जेक्ट भी पढाए जाते हैं।
 

संभावनाएं
एक बेहतरीन पेट्रो एक्सपर्ट के लिए केवल इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट ही विकल्प नहीं हैं, वह माइंस की खुदाई और उसमें से खनिज और ईधन की खोज का काम भी किया जा सकता है। चाहें एग्रीकल्चर हो, परफ्यूम इंडस्ट्री हो या फिर पेंट्स इंडस्ट्री इस तरह के सभी उद्योग-धंधे पेट्रोलियम पर ही निर्भर करते हैं। लुब्रीकेंट्स, पेस्टीसाइड्स, कीटनाशक, केरोसिन, वैक्स और दूसरी तमाम तरह की चीजें किसी न किसी तरह पेट्रोलियम से ही बनी हैं। मार्केटिंग में भी इसकी संभावनाएं बेहद अधिक हैं। जब यहां पेट्रो प्रोडक्ट का इस्तेमाल ज्यादा है, तो इसका भविष्य भी उज्ज्वल है। यही कारण है कि भारत को आज रिफाइनिंग हब कहा जाने लगा है। इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम, ओएनजीसी, रिलायंस, अदानी एस्सार और केयर्स एनर्जी जैसी कई बडी कंपनियां पेट्रो प्रोफेशनल्स को शानदार सैलरी पैकेज पर नौकरियों के ऑफर दे रही हैं। इस समय तकरीबन भारत में 15 लाख से ज्यादा लोग किसी ने किसी तरह इस फील्ड से जुडे हैं। एक अनुमान के मुताबिक, केवल भारत में ही हर साल तकरीबन आठ लाख प्रोफेशनल्स की मांग है। विकल्प के रूप में आपके लिए यूरोप के साथ ही खाडी देशों के भी दरवाजे खुले हैं। अब तक इस फील्ड में सिर्फ जियोलॉजिस्ट और केमिकल इंजीनियरों का ही दबदबा था, लेकिन बढती मांग और फील्ड के विस्तार के साथ विभिन्न क्षेत्रों में इससे संबंधित एक्सपर्ट तैयार हो रहे हैं। कहने का आशय यह है कि पेट्रोलियम इंडस्ट्री अब काफी बडा रूप ले चुकी है। यह एक पेट्रोल पंप से रिफाइनरी डिपो और मल्टीनेशनल कंपनियों तक फैल चुका है। आजकल पेट्रोल पंप मॉल्स की शक्लो-सूरत ले चुके हैं, जहां आपको सुपरवाइजर से लेकर मैनेजर तक की जॉब्स मिल सकती हैं।
 

सैलरी
इस तरह के प्रोफेशनल की मांग देश ही नहीं, विदेशों में भी काफी है। यदि आपके पास पेट्रोलियम सेक्टर से संबंधित डिग्री या डिप्लोमा है और आप अनुभवी हैं तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतर पैकेज पर हाथों-हाथ नियुक्ति पत्र मिल सकता है। फेशर्स की सैलरी कंपनी और उसकी योग्यता पर निर्भर करती है। वैसे ट्रेंड एवं फेशर्स भी तीन लाख से लेकर पांच लाख रुपये तक सलाना पैकेज आसानी से हासिल कर लेते हैं। सरकारी एवं निजी क्षेत्र की कंपनियों में भी आकर्षक सैलरी उपलब्ध है। इस फील्ड के ट्रेंडों का पैकेज विदेशों में कई गुना हो जाता है। यदि विदेश की तरफ रुख करना चाहते हैं, तो अंग्रेजी का बेहतर ज्ञान जरूरी है।
 

कहां से करें कोर्स
आईआईटी, चेन्नई।
लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ।
राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम टेक्नोलॉजी, रायबरेली।
यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम ऐंड एनर्जी स्टडीज, देहरादून।
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी।
इंडियन स्कूल ऑफ माइंस, धनबाद।
पुणे विश्वविद्यालय, पुणे।
महाराष्ट्र इंडस्ट्री ऑफ टेक्नोलॉजी, पुणे।
पंडित दीन दयाल उपाध्याय यूनिवर्सिटी, गांधी नगर।
अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय अलीगढ, उत्तर प्रदेश।
( दैनिक जागरण )





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Wednesday, November 24, 2010



ब्रेड के गुलाब जामुन

ब्रेड के गुलाब जामुन
 

विधि :
पिसी हुई मिश्री में खोया, चिरौंजी और पिसी इलायची मिला दें। ब्रेड को एक प्लेट में फैलाकर दूध में भिगो दें। पांच मिनट बाद ब्रेड को निचोड़ दें ताकि दूध निकल जाएं। इसमें मैदा व सूजी मिलाएं। मिश्रण ज्यादा सख्त नही होना चाहिए।
मिश्रण की छोटी-छोटी गोलियां बनाएं। प्रत्येक गोली में बीच में मिश्री वाला मसाला भर कर बंद कर दें। चीनी और पानी की एक तार की चाशनी बनाकर अलग रख लें।
अब गर्म तेल में मध्यम आंच पर सुनहरे भूरे होने तक गोलियां तले और इन्हें गर्म चाशनी में डाल दें। 2-3 घंटे चाशनी में गोलियां भीगने दें। तैयार हैं गुलाब जामुन। इन पर पिस्ते की कतरन छिड़क कर सर्व करें।
 
सामग्री :
6 ब्रेड स्लाइस, 1 टी स्पून मैदा, 1 टी स्पून बारीक सूजी, 3 टे.स्पून दूध, 1/2 टी स्पून इलायची पाउडर, 1 टे.स्पून, पिसी मिश्री,1 टे.स्पून हल्का भुना हुआ खोया, 1 टी स्पून चिरौंजी, 1 टी स्पून बारीक कटा पिस्ता, तलने के लिए रिफाइंड ऑयल।
कितने लोगों के लिए : 3





गाजर का हलवा




गाजर का हलवा
 

विधि :
गाजर को छीलकर धो लें और कद्दूकस करके दूध के साथ कड़ाही में डालकर लगातार चलाते हुए सारा पानी सुखा लें। जब गाजर का सारा पानी सूख जाये तो उसमें चीनी और घी डालकर अच्छी तरह मिला लें।
खोये को हाथ से मसलकर हलवे में डाल दें। सूखी मेवा और इलायची डालकर कुछ देर लगातार चलाते हुए पकाये। गर्मागर्म सर्व करें।
 
सामग्री :
6 गाजर, 1 कप दूध, 1/2 कप चीनी, 1/2 कप खोया, 1 टे.स्पून बादाम (बारीेक कटा), 5 इलायची, 2-3 पिस्ते, 1/4 कप घी, 1 टी स्पून किशमिश।
कितने लोगों के लिए : 2




मैंगो सोरबे



मैंगो सोरबे
 
विधि :
मैंगो जूस, नींबू का रस और एसेंस एक साथ मिलाकर ठंडा करें। एक कंटेनर में घोल डालें और ढक्कन लगाकर फ्रिजर में तब तक रखें जब तक जम न जाए। फ्रिज से निकालें और ब्लेंडर में डालकर ब्लेंड करें। इसे फिर कंटेनर में डालकर ढक्कन लगाकर फ्रिजर में दोबारा रखें। एक बार और यही क्रिया दोहरा कर फ्रिजर में रखें। अंगूर और पुदीने के पत्ते से सजाकर सोरबे के स्कूप्स आइस्क्रीम ग्लास में निकालकर सर्व करें।
 
सामग्री :
4 कप मैंगो जूस, 2 टी स्पून नींबू का रस,1 टी.स्पून बादाम का एसेंस।
सजावट के लिए:
काले अंगूर या चेरी और पुदीने के पत्ते।
कितने लोगों के लिए : 6




मिस्सी पूड़ी



मिस्सी पूड़ी
 

विधि :
एक परात में आटा और बेसन छान लें अब इसमें सभी मसाले और बारीक कटी प्याज, हरी मिर्च और हरा धनिया डाल दें।
मोयन डालकर अच्छी तरह मिला लें, गरम पानी से गूंध लें आटा रोटी के आटे से थोड़ा सख्त गूंधे जैसे पूड़ी के लिए गूंधते हैं। गीले कपड़े से ढक कर आधे घंटे के लिए रख दें।
आधे घंटे बाद हाथ से लोइयां बना कर, चकले पर बेल कर गरम तेल या घी में तल लें।
गरमागरम मिस्सी पूड़ी अचार, चटनी या सब्जी के साथ सर्व करें।
 
सामग्री :
300 ग्राम गेंहू का आटा, 150 ग्राम बेसन, 1/4 टी स्पून अजवायन, 1 चुटकी हींग, 1/4 टी स्पून लाल मिर्च पाउडर, 1 टी स्पून सूखा धनिया, 1/4 टी स्पून हल्दी, 2 हरी मिर्च, 1 प्याज बारीक कटी हुई, 1/2 कप हरा धनिया, 1 टे.स्पून तेल मोयन के लिए, तलने के लिए तेल आवश्यकतानुसार, नमक स्वादानुसार।
कितने लोगों के लिए : 5




केसरी पनीर



केसरी पनीर
 
विधि :
केसर को एक चम्मच पानी में भिगो दें। अब एक पैन में घी गरम कर उसमें टॉमेटो प्यूरी, लाल मिर्च पाउडर, चीनी और नमक डाल दें। एक मिनट तक चलाकर दही भी डाल दें। 5 मिनट तक लगातार चलाते हुए भून लें अब इसमें पनीर भी डाल दें।
2 मिनट तक पकने दें। अब हरी इलायची पाउडर, भीगी हुई केसर और बादाम के टुकड़ों से सजाकर सर्व करें।
 
सामग्री :
250 ग्राम पनीर, 1/4 टी स्पून केसर, 2 टे.स्पून देसी घी, 1/2 कप टॉमेटो प्यूरी, 1 टी स्पून लाल मिर्च पाउडर, 1 टे.स्पून चीनी, नमक स्वादानुसार, 1 कप दही, 1/4 टी स्पून हरी इलायची पाउडर, 5-6 भुने हुए बादाम (बारीक कटे हुए)।
कितने लोगों के लिए : 3


 

 

 

फ्रूट सलाद



फ्रूट सलाद
 
विधि :
बर्फ चूर-चूर कर लीजिए, संतरा छीलिए और गूदा निकालिए, अनन्नास के गोल स्लाइस काटिए, खरबूजे की छोटी-छोटी फांके कीजिए।
अब एक बड़ी प्लेट में अनन्नास के टुकड़े बिछाकर रखिए। इनके ऊपर बर्फ के छोटे-छोटे टुकड़े रखिए। फिर संतरे के गूदे को बर्फ के टुकड़ों पर फैला दीजिए।
दही-चीनी भलीभांति फेंट लीजिए। इसको संतरों के ऊपर और चारों ओर फैलाइए। दही मलाईदार और मीठा हो, फिर केले और खरबूजे के पतले कतलों को प्लेट के चारों और रखिए। इन सबके ऊपर अनार के दाने और चीकू सजाकर रखिए। ठंडा कर सर्व करें।
 
सामग्री :
1 अनन्नास, 1 लाल दानेदार अनार, 1 रसीला संतरा, 2 केले, 4 चीकू, 5-6 खरबूजे की फांकें, 250 ग्राम दही, इच्छानुसार चीनी और बर्फ।
कितने लोगों के लिए : 5

( दैनिक जागरण )

Monday, November 22, 2010

  तनाव को करेगा दूर ये मंत्र..





 
 


 
 ऊं को निराकार ब्रम्ह का स्वरूप माना गया है।ऊं की ध्वनि एक ऐसी ध्वनि है जिसकी गुंज को बहुत प्रभावशाली माना गया है। ऊं के उच्चारण के कई सारे फायदे हैं। ऊं की ध्वनि मानव शरीर के लिये प्रतिकुल डेसीबल की सभी ध्वनियों को वातावरण से निष्प्रभावी बना देती है।


- विभिन्न ग्रहों से आने वाली अत्यंत घातक अल्ट्रावायलेट किरणों का प्रभाव ओम की ध्वनि की गुंज से समाप्त हो जाता है। मतलब बिना किसी विशेष उपाय के भी सिर्फ ओम् के जप से भी अनिष्ट ग्रहों के प्रभाव को कम किया जा सकता है।- ऊँ का उच्चारण करने वाले के शरीर का विद्युत प्रवाह आदर्श स्तर पर पहुंच जाता है।


- इसके उच्चारण से इंसान को वाक्सिद्धि प्राप्त होती है।


- नींद गहरी आने लगती है। साथ ही अनिद्रा की बीमारी से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाता है।


-मन शांत होने के साथ ही दिमाग तनाव मुक्त हो जाता है।






वो मंत्र जो आपकी जिंदगी बदल सकता है


 
जो मन के तंत्र पर अधिकार रखता है, वही मंत्र है। मन का तंत्र यानि कि मन का सिस्टम। मंत्र एक एसा रिमोट कंट्रोल है जो मन और उसकी अप्रत्याशित शक्तियों को नियंत्रित ही नहीं बल्कि अपनी सुविधानुसार संचालित भी कर सकता है। ध्वनि विज्ञान ही मंत्र का आधार है। ध्वनि की अद्भुत शक्ति के साथ, साधक का मनोबल और एकाग्रता की शक्ति मिलकर एक ऐसी अजेय शक्ति बन जाती है, जिसके लिये कुछ भी असंभव नहीं रहता। इस अजेय शक्ति को साधक जब किसी निर्धारित लक्ष्य पर प्रेषित करता है तो विधि का गुप्त विधान इसके अनुकूल हो जाता है।

एक नई दुनियां- मंत्र विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया भर में आज तक जितने भी मंत्र खोजे या बनाए गए हैं, उनमें गायत्री मंत्र को सर्वोच्च शक्तिशाली व सर्व समर्थ मंत्र होने का दर्जा प्राप्त है। ब्रह्मऋषि विश्वामित्र ने एक सवर्था नवीन सृष्टि रचने का जो अभिनव चमत्कार किया था, वह इस गायत्री मंत्र से प्राप्त शक्ति के आधार पर ही किया था। यह तो एक उदाहरण मात्र है, ऐसे अनेकानेक चमत्कार गायत्री मंत्र के बल पर हो चुके हैं। वेद, उपनिषद्, पुराण आदि तमाम ग्रंथ गायत्री मंत्र के अद्भुत व आश्चर्यजनक चमत्कारों से भरे पड़े हैं। आज भी यदि कोई पूरे विधि-विधान से गायत्री मंत्र की साधना करे, तो भौतिक या आध्यात्मिक लक्ष्य कोई भी हो हर हाल में उसे प्राप्त किया जा सकता है।
 
 
 
 
 

ऐसे पाएं आत्मविश्वास से भरा व्यक्तित्व

 
 





आज इस भागदौड़ से भरे जीवन में कॉम्पीटिशन बहुत बढ़ गया है। हर कोई दूसरे को पीछे धकेलकर खुद आगे बढऩा और उन्नति के शिखर पहुंचना चाहता है।अक्सर मदद ना मिलने के कारण हम पीछे रह जाते हैं। दूसरों से मदद पाने के लिए और उन्हें अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए ये जरूरी है कि आपका व्यक्तित्व आकर्षक हो।


व्यक्तित्व को आकर्षक बनाने में रंग-रूप का कोई महत्व नहीं होता। दरअसल किसी व्यक्ति का आत्मविश्वास कितना है? यह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी व्यक्ति का अपने आप पर विश्वास और कुछ कर गुजरने की चाहत ही उसे आकर्षक बनाती है। अब सवाल ये उठता है कि आत्मविश्वास लाएं कैसे? आत्मविश्वास के लिए सकारात्मक सोच होना बहुत जरूरी होती है। जो सकारात्मक सोचता है वही आत्मविश्वास से भरपूर दिखाई पड़ता है।


यदि आप भी आत्मविश्वास चाहते हैं तो इसके लिए ध्यान सबसे आसान तरीका है। इसलिए हर रोज अपने लिए कुछ समय निकालकर ध्यान जरूर करें। ध्यान एक ऐसा माध्यम है जो पूरे शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। धीरे-धीरे ध्यान का समय बढ़ाते जाएं क्योंकि जितना अधिक समय ध्यान करते हैं उसका चेहरा उतना ही कांतिमय हो जाता है। साथ ही व्यक्तित्व का आकर्षण बढ़ता ही चला जाता है।      ( दैनिक भास्कर )





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Saturday, November 20, 2010

हौंसलों की ऊंची उड़ान

      
हौंसलों की ऊंची उड़ान कहते हैं जीवन संघर्ष का दूसरा नाम है। बडी उपलब्धियां वही हासिल करता है जो निरंतर संघर्ष के लिए तैयार होता है। प्रतिभा तो हर शख्स में होती है, लेकिन सभी बडी उपलब्धियां हासिल नहीं कर पाते। इन्हें हासिल वही करते हैं जो विपरीत स्थितियों से घबराए बगैर यह ठान लेते हैं कि उन्हें यह काम करना ही है और इसमें पूरी तरह सफल होना है। हालांकि इसके पहले यह तय कर लेना जरूरी होता है कि आपको करना क्या है? किस दिशा में जाना है? फिर उस मंजिल तक पहुंचने में चाहे कितनी भी अडचनें और परेशानियां क्यों न आएं, उन्हें हंसते-हंसते झेलने के लिए तैयार रहें। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि किसी भी क्षेत्र में किसी व्यक्ति की सफलता अकेले उसके ही प्रयासों का परिणाम नहीं होता। हर सफल व्यक्ति के पीछे कई लोग होते हैं। वे माता-पिता हो सकते हैं, भाई-बहन हो सकते हैं, पति या पत्नी, बच्चे, मित्र और यहां तक कि अपरिचित लोग भी हो सकते हैं। कभी यह सहयोग आर्थिक होता है, तो कभी भावनात्मक और कभी बौद्धिक भी। विपरीत परिस्थितियों में आप सिर्फ किसी का हौसला बनाए रखें तो यह भी कोई मामूली सहयोग नहीं होगा।
संसार में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अपनी विफलता से हार मान कर ठहर जाते हैं। वे मान लेते हैं कि शायद यही उनकी नियति है। इसके विपरीत कुछ लोग बार-बार विफल होकर भी अपने प्रयास निरंतर जारी रखते हैं। वहीं कुछ लोग यह मानकर कि अब हमारी इस दिशा में संघर्ष की उम्र नहीं रही, अपनी महत्वाकांक्षाएं अपने बच्चों पर थोपते हैं। जबकि कुछ लोग धारा के साथ बहने में यकीन करते हैं और ऐसे ही बडी उपलब्धियां हासिल करते हैं। वे अपने परिवार के छोटे सदस्यों को उसी दिशा में आगे बढने देते हैं, जो वे स्वयं अपने लिए चुनते हैं। वे इसमें ही उन्हें सहयोग करते हैं। जिन्हें यह सहयोग मिलता है, उनके लिए रास्ता थोडा आसान हो जाता है। कुछ और हो न हो, कम से कम इतना तो होता ही है कि उनका हौसला बना रहता है और संघर्षो के दौर में हौसले का बने रहना मामूली बात नहीं है।
विपरीत परिस्थितियों के बावजूद
वैसे ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है, जिन्होंने हर तरह से विपरीत परिस्थितयों के बावजूद वह सब हासिल किया, जो चाहा। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम इसके जीवंत उदाहरण हैं। बचपन में उन्होंने बहुत कठिनाइयों और आर्थिक संकटों के बावजूद पढाई जारी रखी। तब शायद कोई नहीं जानता रहा होगा कि यह मेधावी छात्र एक दिन राष्ट्र का नेतृत्व करेगा और नया इतिहास रचेगा। तमाम कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपनी जगह बनाई।
आज संसार में सबसे अमीर आदमी के रूप में प्रतिष्ठित बिल गेट्स का बचपन आर्थिक तो नहीं, पर भावनात्मक रूप से संघर्षपूर्ण रहा है। ये अलग बात है कि अपनी धुन के पक्के बिल गेट्स ने कभी इन बातों की परवाह नहीं की। बिल गेट्स बचपन में निहायत जिद्दी रहे हैं। वह अपनी बहनों के साथ घुलमिल भी नहीं पाते थे। बेहद इंट्रोवर्ट  थे। मां के दिए किसी भी काम को वह पूरा नहीं करते, क्योंकि उनकी अलग दुनिया थी जिसमें वह खोए रहते। काम पूरा न होने पर मां खीझती। एक दिन इंटरकॉम  पर मां ने पूछा किबिल तुम क्या कर रहे हो तो बिल ने चिल्ला कर जवाब दिया कि सोच रहा हूं। मां इस जवाब पर हैरान रह गई। चिंतित मां बिल को मनोवैज्ञानिक के पास ले गई। उन्हें समझते देर नहीं लगी कि यह बच्चा कुछ अलग है। उन्होंने बिल को सही दिशा और पूरी रचनात्मकता देने की कोशिश की। उन्हें ढेर सारी किताबें पढने को दीं। बिल की मां से कहा कि इस बच्चे को अपनी राह पर चलने दें। सिएटल के सबसे महंगे स्कूल लेकसाइड में उनका एडमिशन करवाया गया। यहां आकर उनकी दोस्ती कंप्यूटर से हुई। जो उनका भविष्य बना। यहां केवल 13  साल की उम्र में उन्होंने प्रोग्रामिंग और सॉफ्टवेयर डेवलप  करनी शुरू कर दी। कंप्यूटर के बादशाह बन गए।
हर बच्चा है विशेष
याद रखें कि हर बच्चा अपने-आपमें विशेष है। केवल अपने माता-पिता के लिए ही नहीं, बल्कि समाज और देश के लिए भी। हर बच्चे के भीतर कोई न कोई खास प्रतिभा और योग्यता जरूर होती है। सवाल उसे प्रोत्साहन देकर बाहर निकालने का है। वैसे तो बच्चे को यह वरदान कुदरत से ही मिला है कि वह हर पल खुश रहे, ऊर्जावान रहे और निरंतर आगे बढने की कोशिश करे। यह भी महत्वपूर्ण है कि इस सबके लिए उसे पारिवारिक माहौल, भरपूर स्नेह और सही समझ की जरूरत होती होती है। उसे चाहिए ऐसा सुरक्षा चक्र जो न केवल उसे आश्वस्त रखे, बल्कि भावनात्मक और व्यावसायिक मामलों में भी उसका बडा संबल बने। जो पेरेंट्स अपने बच्चों को यह माहौल दे पाते हैं उनके बच्चे आगे निकल आते हैं। वहीं जिन्हें यह माहौल नहीं मिल पाता है वे पीछे छूट जाते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि जिस तरह किसी की सफलता में कई लोगों का हाथ होता है, वैसे अपनी विफलता के लिए भी कोई व्यक्ति अकेले जिम्मेदार नहीं होता है।
पहचानें क्षमताओं को
डॉ. जयंती  दत्ता का मानना है, हर बच्चे के भीतर विकास की जबरदस्त  क्षमता होती है। हम ही उसे बचपना कहकर टाल देते हैं। जरूरत उसकी क्षमताओं को पहचान कर, उसे समझने और विकसित करने की है। यह काम यदि अपने से संभव न हो तो किसी प्रोफेशनल की मदद भी ली जा सकती है। इसके लिए बेहतर होगा कि सबसे पहले अपने बच्चे से अच्छे रिश्ते बनाएं। उसे समझने की कोशिश करें। कई बार नन्हे दिमाग में भी बडे काम की बात छिपी होती है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि किसी भी व्यक्ति की सफलता की नींव भावनात्मक लगाव पर ही टिकी होती है। इसे मजबूत ब नाएं। परवरिश अनूठी चीज है जो बच्चों की प्रतिभा  को तराशने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पेरेंट्स की यह कोशिश होनी चाहिए कि इसमें कहीं कोई कमी न रह जाए। साथ ही उसकी पढाई भी बाधित न हो यह भी ध्यान रखें।
हर माता-पिता का यह कर्तव्य है कि वे बच्चों को आगे बढने में मदद करें। लेकिन इस क्रम में मूल्यों से वे टूटने न पाएं, इस बात का भी खयाल रखें। क्योंकि आपसे उनके जुडाव की स्थिति भी पूरी तरह बच्चों को आपके दिए संस्कारों पर ही निर्भर है। हमारे समाज में ऐसे पेरेंट्स की कमी नहीं है, जिन्होंने कई स्तरों पर संघर्ष कर अपने बच्चों को उसी दिशा में आगे बढाने की हर संभव कोशिश की, जिधर उन्होंने जाना चाहा। इस बार मिलते हैं कुछ ऐसे ही पेरेंट्स से, जिनके बच्चों ने उनके सहयोग से समाज में अपनी खास पहचान बनाई।
मेहनत के साथ किस्मत भी चाहिए
पिता, देवाशीष  मुखर्जी
मुंबई आने से पहले मैं दिल्ली में एक मल्टीनेशनल  कंपनी में विजुअल मैनेजर था। 2003  में मैं परिवार समेत मुंबई आ गया। शुरू से ही मेरी दिलचस्पी नाटकों, टीवी धारावाहिकों तथा फिल्मों में अभिनय करने की थी। मैं एफ.टी.आई. में दाखिला लेना चाहता था, मगर ग्रेजुएशन के बाद ही दाखिला मिल सकता था। 1992  में आशा चंद्रा इंस्टीट्यूट से अभिनय में डिप्लोमा किया। काम करते हुए भी मेरे अंदर का कलाकार कई बार मेरे सामने आकर खडा हो जाता। मेरी कशमकश को मेरी पत्नी समझती थी। उसने मुझे अभिनय में ही करियर बनाने की सलाह दी। वह स्वयं रेयान इंटरनेशनल स्कूल में वाइस प्रिंसिपल है। मुंबई आने के बाद मेरी दोस्ती कुछ डिस्ट्रीब्यूटर्स से हो गई थी, जो बहुत काम आई। उनकी मदद से मुझे छोटा-मोटा काम मिलता रहा। मगर अविनाश ने वह कर दिखाया जो मैं नहीं कर सका। सच है कि टेलीविजन की दुनिया में नाम कमाने वाले अविनाश ने मेरे सपनों को सच किया है। टेलीविजन में काम करने का फैसला अविनाश का अपना फैसला है और ये फैसला उसने केवल 9  वर्ष की उम्र में लिया था। उसका पहला सीरियल था मन में है विश्वास जिसमें उसने फरहान के बचपन का किरदार निभाया था। इस सीरियल की विशेषता थी सौ पेज की स्क्रिप्ट और उर्दू भाषा। पहले मुझे लगा ये नहीं कर पाएगा, मगर इसके आत्मविश्वास ने उसे भी संभव बना दिया। मन में है विश्वास के बाद अविनाश राजकुमार आर्यन में नजर आया, मगर उसकी असली पहचान बालिका वधू के जगदीश  से बनी। पहले उसकी पहचान मुझसे थी, मगर आज मेरी पहचान उससे है। यह इंडस्ट्री महज एक इत्तफाक है। यहां कब, कौन, कहां पहुंच जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। जिस दिन अविनाश को न्यू टैलेंट अवॉर्ड से नवाजा गया वह मेरी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण दिन था। जब अविनाश आठ साल का था तब नोएडा में एक डांस कॉम्पीटिशन  में भाग लेना चाहता था। मगर मैंने इंकार कर दिया, क्योंकि उसे नाचना नहीं आता था। मेरे लाख मना करने के बावजूद उसने उसमें भाग लिया और प्रथम आया। मुझे उसके आत्मविश्वास और हौसले का लोहा मानना ही पडा। जैसा कि मैं आपसे पहले ही कह चुका हूं कि हमें आर्थिक रूप से कभी कोई परेशानी नहीं रही है। मगर अविनाश का यह मानना है कि हमें आम लोगों की तरह व्यवहार करना चाहिए और भूख लगने पर बडा पाव खाना चाहिए, क्योंकि यही संघर्ष की पहचान है। वैसे भी स्वभाव से वह मिलनसार और दूसरों को सम्मान देने वाला लडका है। भविष्य में हमारी इच्छा उसे सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनाने की है। यह उसका सपना है।
मैंने हमेशा संतुलन बनाए रखा
मां, शिल्पा खारा
स्वीनी की सफलता के पीछे हमसे अधिक स्वीनी की अपनी मेहनत है। स्वीनी  ने साढे तीन साल की उम्र में अपना पहला कमर्शियल  एड अजंता टूथब्रश का किया था। उसके बाद उसने दूरदर्शन पर एक शो किया। उस समय स्वीनी  बहुत छोटी थी। मैं हमेशा उसके साथ रहती थी। उसकी सबसे बडी खासियत यह थी कि उसे कैमरे या स्टेज का डर  बिलकुल नहीं था। यही वजह है कि स्कूल के अधिक से अधिक कार्यक्रमों में वही नजर आती थी। स्वीनी  की प्रतिभा से प्रभावित होकर मैंने उसका पोर्टफोलियो बनवाया। स्वीनी के फोटोग्राफ्स  कई प्रोडक्शन हाउसेज को भेजीं। इत्तफाक से कुछ ही महीनों में हमें सकारात्मक जवाब आने लगे। जहां कहीं ऑडिशन  होता मैं स्वीनी  को ले जाती। मुझे खुशी है, एक मां होने के नाते मैंने जो अपार क्षमताएं स्वीनी  में देखीं, उनको लोगों ने भी सराहा। 2005  में जब उसे अमिताभ जी के साथ फिल्म चीनी कम मिली वो लम्हा  मेरे लिए सबसे यादगार था। उस फिल्म में बच्चन जी के सामने काम करना स्वीनी  के लिए कितना चुनौतीपूर्ण था, मैं नहीं जानती। मेरे लिए यह बहुत बडी बात थी। इसके लिए मैं बच्चन जी को धन्यवाद दूंगी, जिन्होंने स्वीनी  से दोस्ती करके उसे फिल्म में एकदम सहज कर दिया। वैसे इसके लिए एक हफ्ते की वर्कशॉप  भी काम आई जो निर्देशक ने करवाई थी।
स्वीनी  अब तक 75  कमर्शियल  और 13  फिल्में कर चुकी है। सभी बडे ब्रैंड तथा सेलिब्रिटीज केसाथ काम कर चुकी है। मगर आज भी वह लम्हा मेरे दिल की अनंत गहराइयों में बसा हुआ है, जब वह पहली बार टेलीविजन पर नजर आई थी। स्वीनी  ने यूं तो सबसे पहले अजंता  टूथब्रश  का विज्ञापन किया था, मगर वह विज्ञापन तब तक टेलीविजन पर नहीं आया था। उससे पहले उसका दूरदर्शन पर पहला कार्यक्रम आया, जो घुंघरूओं पर आधारित था। जिस दिन रात को साढे आठ बजे उसका एपिसोड  दिखाया जाने वाला था, हमारे घर में त्योहार जैसा माहौल था। उसे कभी ऐसा नहीं लगा कि उस पर काम और पढाई का काफी दबाव है। उसने दोनों चीजों को बेहद समझदारी और खूबसूरती से हैंडल किया। फिलहाल मैं उसे कोई भी फिल्म या कोई प्रोजेक्ट हाथ में लेने नहीं दे रही। मुझे लगता है कि अभी स्वीनी  के लिए पढाई बहुत जरूरी है। उसे अपना पूरा ध्यान पढाई पर ही देना चाहिए।
स्वीनी की सफलता के पीछे हमसे अधिक स्वीनी  की अपनी मेहनत है। स्वीनी  ने साढे तीन साल की उम्र में अपना पहला कमर्शियल  एड अजंता टूथब्रश का किया था। उसके बाद उसने दूरदर्शन पर एक शो किया। उस समय स्वीनी  बहुत छोटी थी। मैं हमेशा उसके साथ रहती थी। उसकी सबसे बडी खासियत यह थी कि उसे कैमरे या स्टेज का डर  बिलकुल नहीं था। यही वजह है कि स्कूल के अधिक से अधिक कार्यक्रमों में वही नजर आती थी। स्वीनी की प्रतिभा से प्रभावित होकर मैंने उसका पोर्टफोलियो बनवाया। स्वीनी के फोटोग्राफ्स  कई प्रोडक्शन हाउसेज को भेजीं। इत्तफाक से कुछ ही महीनों में हमें सकारात्मक जवाब आने लगे। जहां कहीं ऑडिशन  होता मैं स्वीनी को ले जाती। मुझे खुशी है, एक मां होने के नाते मैंने जो अपार क्षमताएं स्वीनी  में देखीं, उनको लोगों ने भी सराहा। 2005  में जब उसे अमिताभ जी के साथ फिल्म चीनी कम मिली वो लम्हा मेरे लिए सबसे यादगार था। उस फिल्म में बच्चन जी के सामने काम करना स्वीनी  के लिए कितना चुनौतीपूर्ण था, मैं नहीं जानती। मेरे लिए यह बहुत बडी बात थी। इसके लिए मैं बच्चन जी को धन्यवाद दूंगी, जिन्होंने स्वीनी  से दोस्ती करके उसे फिल्म में एकदम सहज कर दिया। वैसे इसके लिए एक हफ्ते की वर्कशॉप  भी काम आई जो निर्देशक ने करवाई थी।
स्वीनी  अब तक 75  कमर्शियल  और 13  फिल्में कर चुकी है। सभी बडे ब्रैंड तथा सेलिब्रिटीज के साथ काम कर चुकी है। मगर आज भी वह लम्हा मेरे दिल की अनंत गहराइयों में बसा हुआ है, जब वह पहली बार टेलीविजन पर नजर आई थी। स्वीनी  ने यूं तो सबसे पहले अजंता  टूथब्रश  का विज्ञापन किया था, मगर वह विज्ञापन तब तक टेलीविजन पर नहीं आया था। उससे पहले उसका दूरदर्शन पर पहला कार्यक्रम आया, जो घुंघरूओं पर आधारित था। जिस दिन रात को साढे आठ बजे उसका एपिसोड  दिखाया जाने वाला था, हमारे घर में त्योहार जैसा माहौल था। उसे कभी ऐसा नहीं लगा कि उस पर काम और पढाई का काफी दबाव है। उसने दोनों चीजों को बेहद समझदारी और खूबसूरती से हैंडल किया। फिलहाल मैं उसे कोई भी फिल्म या कोई प्रोजेक्ट हाथ में लेने नहीं दे रही। मुझे लगता है कि अभी स्वीनी के लिए पढाई बहुत जरूरी है। उसे अपना पूरा ध्यान पढाई पर ही देना चाहिए।

मेरे सपने आकाश ने पूरे किए
मां, ज्योति नायर
मुझे अभिनय से लगाव था, लेकिन उस दौर में न तो बच्चों के लिए टैलेंट कॉन्टेस्ट थे, न रिअलिटी शोज  थे। मेरी बडी बेटी आकांक्षा होनहार है, पर उसे एक्टिंग में दिलचस्पी नहीं थी। जबकि आकाश को शुरू से अभिनय व भिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों में दिलचस्पी रही है। मुझे लगा था कि जिन कलाओं में मेरा रूझान था, उन्हें करने का मौका मुझे नहीं मिला। यदि आकाश में हुनर  है तो वह क्यों न उन्हें पूरा करे? मुझे नहीं पता था कि गलाकाट प्रतियोगिता  के युग में आकाश को कैसे मौका मिलेगा? हमारा कोई जानकार नहीं था, हमने जस्ट  डायल सर्विस  के जरिये मौके तलाशने की कोशिश की। निर्माता शिवेंद्र सिंह डुंगरपूर को आकाश में अपार संभावनाएं नजर आई। आकाश ने उनके लिए ब्रिटैनिया बिस्किट्स का एड किया। उस वक्त आकाश केवल छ: साल का था। आकाश के पिताजी बिल्डर  हैं, उन्हें समय कम मिलता है। मैंने ही किसी तरह तालमेल बैठाया। आकाश ने 75  विज्ञापन फिल्मों में काम किया। उसे कई ब्रैंडस  के लिए पहचाना जाने लगा। आगे चलकर उसे भाभी धारावाहिक में काम मिला। हां, मैंने आकाश की मानसिकता ऐसी बनाई कि वह सकारात्मक ढंग से असफलता को भी स्वीकार करे। शूटिंग के दौरान मिलने वाला खाना ठीक नहीं होता। लिहाजा उसका खाना-पानी, ब्रेकफस्ट, स्नैक्स साथ लेकर जाती हूं। वह पांच-छ: साल की उम्र से काम कर रहा है, लेकिन उसने अपनी पढाई पर असर कभी पडने नहीं दिया। उसे अपनी प्राथमिकताएं  समझ आने लगी हैं। हाल ही में महत्वाकांक्षी  धारावाहिक में आकाश ने बाल गणेश का किरदार निभाया। ऑडिशन की सारी परीक्षाओ ं से गुजर कर आकाश उत्तीर्ण हुआ। आगे भी कम मुश्किलें नहीं थीं, उसे गणेश के किरदार के लिए कई-कई घंटे सूंड  लगाकर रहना पडा। इस बीच वह कुछ खा-पी नहीं सकता था। उम्र कम होने के कारण तरस भी आता, सारी परेशानियों को आकाश ने हंसते हुए सहन किया। अब तक की उसकी जो भी उपलब्धियां  हैं, उसमें हम पेरेंट्स के अलावा उसकी बहन आकांक्षा और सारे टीचर्स का भी योगदान है। उन सभी के सहयोग के बिना आकाश की यह सफलता असंभव थी।
मुझे उस पर  पूरा विश्वास है
पिता, मिथिलेश कुमार शर्मा
तेजस्वी मात्र नौ महीने का था जब बिहार के आरा जिले के गांव जगदीशपुर में पोलियो का गलत इंजेक्शन लगाने से उसका पैर खराब  हो गया। एक अपाहिज की जिंदगी जीना किसी कष्टदायक चुनौती से कम नहीं था। किसी तरह कक्षा तीन तक उसने वहां पढाई की और सन 2000 में हम दिल्ली आ गए। यहां उसने के.जी. से पढाई आरंभ की। जिससे कि वह इंग्लिश माध्यम में पढ सके। वह बच्चों को खेलते-कूदते देखता तो सोचता काश वह भी इन बच्चों जैसा बन पाता। दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में उसे दिखाया। उसका ऑपरेशन हुआ। पहले दो महीने प्लास्टर चढा, फिर बैसाखी दी गई। इसके बाद कैलिपर  की सहायता से वह चलने लगा। मैंने उसका आत्मविश्वास हमेशा बनाए रखा। मैं खुद  बहुत अच्छा योगा जानता हूं। इसलिए मैंने उसे बचपन से सिखाना शुरू कर दिया था। नब्बे प्रतिशत अंक लाने और योग्यता परीक्षा पास करने पर भी उसे प्रवेश दिलाने के लिए मुझे अतिरिक्त प्रयास करने पडे। इतनी फीस देना भी मेरे बस से बाहर था। एक दिन उसके दोस्त ने उसे बताया कियोग की स्टेट लेवल पर प्रतियोगिता होने जा रही है, तुम उसमें भाग लो। उसकी योग टीचर वंदना मैडम ने कुछ आसन और क्रियाएं पूछीं। तेजू ने सभी का जवाब मुस्तैदी से दिया। इस प्रकार उसने वाराणसी जाकर उस प्रतियोगिता में भाग लिया और स्वर्ण पदक जीता। उसने जूडो-कराटे सीखना शुरू किया। इंटरनेशनल मैथमैटिक्स ओलंपियाड में उसने स्वर्ण पदक हासिल किया। सरप्राइज  हिंदी परीक्षा में वह हाईस्कूल प्रतियोगिता में प्रथम आया। अंग्रेजी सुधारने के लिए इंग्लिश स्पीकिंग  कोर्स किया। यहां डिबेट प्रतियोगिता में स्टार परफॉर्मर  का अवॉर्ड जीता। पढने के अलावा उसे भजन लिखने का भी शौक है। वह कलेक्टर बनना चाहता है।
मेधावी है वह
मां, सीमा भटनागर
मुझे जन्म से ही आंखों की तकलीफ थी। ऑब्टिकल न‌र्व्स  कमजोर हो जाने पर इन न‌र्व्स पर लाइट पडने से ही विजन क्लीयर  होता है। कमजोर होने पर ही देखने में परेशानी आती है। एक दृष्टिहीन की परेशानी क्या होती है, यह मैं अच्छी तरह जानती थी। शादी के बाद मैं बच्चे को जन्म देने में इसीलिए डर रही थी, लेकिन बेटी सामान्य पैदा हुई। फिर बेटा अविचल हुआ। लगा सब कुछ ठीक-ठाक है। लेकिन अपने भीतर के संदेह को दूर करने के लिए मैं इसे इंदौर में डॉ. हार्डिया  के पास ले गई। उस समय यह तीन महीने का था। गई मैं अपने लिए थी। उन्होंने चेक करते ही बता दिया कि इसे भी कॉर्निया की परेशानी है। वह दिन मैं अपने जीवन में कभी भूल नहीं पाऊंगी। इतना गहरा आघात लगा कि पूरी रात मैं रोती रही और जी भर कर भगवान को कोसती रही। डॉक्टर ने कहा कि आपका ऑप्रेशन  देर से नौ साल की उम्र में हुआ था। आप इसका ऑपरेशन अभी करा लेंगी तो फायदा होगा। अपने इलाज के पैसों से मैंने उसका ऑपरेशन करा लिया। जितनी सावधानियां बरतने को कहा गया सब बरतीं। पूरी सेवा की। लगा कि शायद रास्ते आसान हो गए। लेकिन इसकी आंख में एक सफेद स्पॉट था। हम डॉक्टर के पास ले जाते वे कहते कि झिल्ली सी आ जाती है। तकनीकी जानकारी हमें थी नहीं। अलीगढ ले गए, वहां डॉक्टर ने देखकर बता दिया कि ग्लूकोमा हो गया है। उन्होंने कहा कि कॉर्निया ट्रांसप्लांट  होगा, लेकिन सफलता की संभावना आधी-आधी है। आंख ठीक भी हो सकती है और जा भी सकती है। लगा कि कहीं जो रोशनी है उससे भी वंचित न हो जाना पडे। इसलिए वापस आ गए। हमने इसे ब्लाइंड स्कूल में डाल दिया। मैं जानती थी कि छोटा होने के कारण इसे बहुत परेशानियां आएंगी। अकेला और लाचार बच्चा इसे हैंडल नहीं कर सकता था। वह बीमार रहने लगा। मैं उसे वापस ले आई। इसे नेशनल ब्लाइंड एसोसिएशन में भर्ती कराया। सेंटर फॉर साइट में दिखाया तो उन्होंने बताया कि ग्लूकोमा  मेच्योर  हो गया है। यहां ऑपरेशन  कराया 2007  में। काफी ठीक नजर आने लगा। लेकिन यह खुशी  ज्यादा  दिन नहीं रही। बॉडी  ने कॉर्निया  रिजेक्ट कर दिया। जहां से शुरू किया था वहीं वापस खडे थे। फिर उसे दिल्ली के आर.के.पुरम स्थित डी.पी.एस. में एडमिशन कराया। मुझे लगता है कि विशेष बच्चों को सामान्य धारा के बच्चों के साथ पढाने के बहुत फायदे हैं। वे दुनिया से अलग-थलग नहीं रहते। इसकी सबसे बडी खासियत  यह है कि इसका दिमाग तेज है। तेजी से चीजों को ग्रहण करता है। अपने स्कूल की अनेक सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लेता है। अखिल भारतीय भाषण प्रतियोगिता में अविचल को दिल्ली में पहला और राष्ट्रीय स्तर पर दूसरा पुरस्कार मिला। इसमें उसे लैपटॉप, ट्रॉफी तथा सर्टिफिकेट मिला। संगीत में उसकी रुचि है। बांसुरी बजाना उसे पसंद है। अकेले आने-जाने की असुविधा के कारण उसे सीखने में परेशानी आती है। मैं चाहती हूं कि वह स्वावलंबी बने। वह राजनेता बनना चाहता है। जिंदगी की सच्चाइयों से अभी परिचित नहीं है।
हमारे हाथ में कुछ नहीं
पिता, ब्रजमोहन
मेरे दो बेटे हैं। बेहद साधारण परिवार है हमारा। जब रितेश  एक साल का हुआ तब हमें पता चला कि इसे ठीक से सुनाई नहीं देता। आर्थिक अभावों के कारण हम इसका इलाज ठीक से नहीं करा सकते थे। सुन न पाने के कारण यह बोलने में असमर्थ था। अस्पतालों के चक्कर भी लगाए, लेकिन बहुत फायदा नहीं मिला। सेाचा कि गूंगों-बहरों के स्कूल में डालूं। लेकर गया लेकिन साइन लैंग्वेज  सिखाने वालों का कहना था कि यह उस श्रेणी में नहीं आता। इसे उसकी जरूरत नहीं है। सामान्य धारा वाले कहते कि यह मेन स्ट्रीम में नहीं चल पाएगा। समझ में नहीं आ रहा था कि कहां जाएं, क्या करें? एच.सी.आर.ए. (हैंडीकैप्ड चिल्ड्रन रिहैबिलिटेशन एसोसिएशन) का पता मिला। वहां ले गए। डॉक्टर  ने कान में हियरिंग  एड लगाने की सलाह दी। वास्तव में स्पीच थेरेपी उसके लिए जरूरी थी। उसी से कुछ सुधार की उम्मीद थी। लेकिन महंगी होने के कारण हमारे बस से बाहर थी। अब यही संस्था हमारे बच्चे की परवरिश में मदद करती है। इसी के कारण वह विशेष बच्चों के ओलंपिक में भाग ले पाया। गोल्ड मेडल जीतने की खुशी जितनी उसे है, उतनी ही हमें भी है। शायद वह कहीं और पैदा हुआ होता तो अपनी योग्यता का सही इस्तेमाल कर पाता। संस्था के हर कार्यक्रम व गतिविधियों में वह हिस्सा लेता है। बच्चे उसका मजाक बनाते, पर हम समझाते हैं। बडा भाई नौवीं क्लास में है। वह पूरे तौर पर सामान्य है। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह सक्षम बन सके और तमाम कठिनाइयों के बाद भी अपनी खुद की जगह बना सके। मेरे बस में जो कुछ भी संभव है वह मैं जरूर करूंगा। आगे उसका भाग्य है।
उसकी कामयाबी पर यकीन था
मां, आरती श्रीकांत मायदेव
जब वह पांच साल की थी। उसकी बहन मनाली एक्टिंग कर रही थी। तभी एक दिन मैंने देखा कि नन्हीं शेफाली  भी उसकी नकल कर रही थी। पहले तो हम परेशान हुए। हमने उसे समझाने की बहुत कोशिश की कि बेटा पहले पढाई को अहमियत दो, इसके लिए अभी समय नहीं है। लेकिन उसने दृढता से कहा कि मैं सब कर लूंगी, मां आप चिंता न करें। उसका दृढ निश्चय देखकर हमें उसका साथ देना पडा। मैं उसके आत्मविश्वास को देखकर दंग रह गई। पहले तो यही डर था कि हम लोग मराठी हैं। हिंदी अच्छी नहीं आती, लेकिन अब तो उसने बिहारी भाषा को अपना लिया है। मैं भी मां हूं, इसलिए मुझे तो मदद करनी ही थी। मैं नौकरी करती थी। सबसे पहले इस शो के लिए ऑडिशन  दिलवाने के लिए गए। जब लगा कि सलेक्शन  हो गया है और उसे तब मेरी जरूरत थी। एक तो वह छोटी थी दूसरे नासमझ भी। उसे दुनियादारी  की समझ ही कितनी थी। इसलिए मैंने नौकरी छोड दी। उसे समय पर सब काम कराना होता है और पढाना भी होता है। इसके लिए कई समझौते किए, लेकिन वे ऐसे समझौते हैं, जिससे मेरी और मेरे बच्चे की भलाई होनी है और वे मामूली हैं जैसे कई बार खाना नहीं बनाया। वक्त पर पहुंचना है उसके लिए भी कम कठिनाइयां नहीं झेलीं। सबसे पहले तो मराठी होने के कारण हिंदी बोलने की समस्या थी। फिर यह धारावाहिक तो बिहारी पृष्ठभूमि का होने के कारण भोजपुरी बोली से सराबोर था। लेकिन किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं आई। सब सहज ढंग से चलता रहा। पहली शुरुआत चार साल की उम्र में हुई जब इसे मराठी सीरियल में काम करने को मिला था। उसके बाद मराठी फिल्म मिली। उसके बाद हिंदी धारावाहिक अगले जनम.. में काम मिला। जब बच्चे को सफलता मिलती है, तो हर मां को खुशी होती है। मुझे भी हुई।
पूरा जीवन एक प्रतियोगिता है
मां, सायरा  मुसानी
शायद आपको जान कर आश्चर्य होगा कि यह बहुत छोटी उम्र से ही कुछ अलग दिखने लगी थी। जब यह केवल दो साल की थी तभी मुझे इसके शौक और काबिलियत का अंदाजा हो गया था। वह बहुत छोटी उम्र से ही सबका ध्यान अपनी ओर खींचती। मां होने के नाते जो कुछ भी कर सकती थी मैंने किया। लेकिन इतना जरूर कहूंगी कि मैंने कुछ खास  नहीं किया। वह जिस स्वभाव की थी उसके लिए यह करना जरूरी भी था। केवल इतना जरूर किया कि इसे ऑडिशन  केलिए लेकर मुंबई आए। यूं हम मूल रूप से गुजरात के निवासी हैं। बाकी काम अपने आप होता चला गया समझौते हर व्यक्ति को अपने तरीके से करने ही पडते हैं। किसी की भी जिंदगी आसान नहीं। अफसा में खूबी  है सबका मन जीत लेने की। इसमें उसे क्षण भर भी नहीं लगता। सबको अपना बना लेती है।
जीवन है ही एक प्रतियोगिता। इसलिए इसमें परेशानियां तो आएंगी ही। समझौते भी अपने-अपने तरीकों से करने ही पडते हैं। छोटी है उसका पूरा ध्यान रखना पडता है। हर समय उसके लिए मार्गदर्शक बनकर खडे रहना पडता है। काम के साथ-साथ उसकी पढाई का भी ध्यान रखना पडता है। वह जितनी छोटी है उसे अकेला एक क्षण के लिए भी नहीं छोडा जा सकता। यदि हमें कामयाबी चाहिए तो निरंतर आगे बढते रहना होगा। हार के डर से रुक नहीं जाना। मेरा खुद  भी इस बात पर पूरा यकीन है। इसका यह पहला धारावाहिक है। इसी में व्यस्त है। काफी शोहरत भी मिल रही है। आगे क्या कैसे चलेगा अभी से कुछ नहीं कहा जा सकता।


ऐसे बनें विकास में सहयोगी :

1.  बच्चे के सबसे करीब आप ही हैं इस निकटता का लाभ उठाएं।
2.  बच्चा यह चाहता है कि बडे उस पर भरोसा करें और उसकी सहायता भी करें।
3 . यह समझने की कोशिश भी करें कि बच्चा जो व्यवहार कर रहा है उसके पीछे क्या भावना काम कर रही है।
4 . ऐसी योजना बनाएं जिससे आप बच्चे से दो कदम आगे रहें।
5 . बजाय इसके कि आप गुस्सा हों या नाराजगी दिखाएं, खुश  रहें और बच्चे के साथ संतुलित व्यवहार रखें।
6 . बच्चे के लक्ष्य के प्रति लापरवाही या उदासीन रवैया न रखें, बल्कि उसे गंभीरता से लें।
7 . बच्चे की कमजोरियों को धैर्य से नियंत्रित करें और उसे सही राह पर ले जाने में मदद करें।
8 . अपने पर पूरा नियंत्रण रखते हुए सहनशीलता के साथ योजना बनाकर काम करें।
9 . मुश्किलों से घबराएं नहीं।
10 . आने वाले अच्छे कल के साथ उसके अनदेखे पहलुओं को भी नजरअंदाज न करें।


(साक्षात्कार दिल्ली से प्रीति, रतन और मुंबई से पूजा सामंत व रजनी गुप्ता)
( दैनिक जागरण ) 
प्रीति सेठ












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Tuesday, November 16, 2010




        ऐसा होता है साफ दिल का इंसान






आम जीवन में धार्मिक या आध्यात्मिक होने का मतलब धार्मिक उपदेश देते किसी खास इंसान से होता है। जबकि साधारण जिंदगी से अलग होकर जब कोई व्यक्ति अध्यात्म की ओर बढ़ता है, तब उसे किसी ऊपरी दिखावे या बनावटी बातों की जरूरत नहीं होती। क्योंकि अध्यात्म का संबंध आत्मा से होता है। इसलिए वह भलाई, भद्रता और विनम्रता के रुप में बाहर दिखाई देता है। यहां जानते हैं उन लक्षणों को, जो अध्यात्म की ओर बढ़ते हुए व्यक्तित्व की पहचान होते हैं। जिसे सही मायनों में उदारता और आम भाषा में साफ दिल का इंसान भी कहा जाता है -


- वह इतना सरल, सहज और निस्वार्थ हो जाता है कि वह अधिकारों के स्थान पर सिर्फ कर्तव्यों को याद रखता है।
 

- वह किसी भी तरह की हानि या नुकसान होने पर भी आवेश, बदले की भावना से दूर होता है और उल्टे ऐसी हालात में स्नेह और माफी को महत्व देता है।
 
- वह दूसरों की गलतियां देखने, बुराई या ओछे विचारों से दूर रहता है और केवल गुणों और अच्छाईयों को ढूंढता और अपनाने की कोशिश करता है।
 
- ऐसा व्यक्ति बहुत ही धैर्य और संयम रखने वाला होता है। जिसके कारण वह बुरी लतों और गलत कामों से स्वयं को भटकाता नहीं है।
 
- दु:ख हो या सुख उसका व्यवहार और विचार संतुलित होते हैं। वह विपरीत हालात में घबराता नहीं है और नहीं सुख में अति उत्साहित होता है।
 
- कर्तव्यों की ही सोच होने से वह हर तरह की इच्छाओं यानि वासना पर काबू कर लेता है। इससे वह अपनी मानसिक शक्तियों का उपयोग भजन, संगीत, रचनात्मक कामों जैसे चित्रकारी, लेखन, साहित्य के पठन-पाठन में लगाता है।
 
- वह निर्भय होता है। वह मानसिक रुप से इतना जुझारू होता है कि इच्छाशक्ति से अपने लक्ष्य को पा लेता है।

अगर आपकी या किसी नजदीकी व्यक्ति की जिंदगी में कुछ ऐसे ही बदलाव नजर आ रहे है तो समझे ऐसे कदम वास्तविक सुख और शांति की ओर बढ़ रहे हैं।  ( दैनिक भास्कर )








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रात में टेंशन फ्री होकर करें पढ़ाई




सुबह महत्वपूर्ण परीक्षा है और पढ़ने के लिए सिर्फ आज की रात ही बाकी है। या सुबह तक कोई प्रोजेक्ट पूरा करना है और समय भागता जा रहा है। कारण कोई भी हो टेंशन के मारे रात भर नींद नहीं आती। रात तो खराब होती ही है अगला दिन भी खराब होता है। यहां कुछ टिप्स हैं, जिन पर अमल करेंगे तो तनाव की बजाय काम होगा।  काम करते रहें: अपना काम करते रहें। काम बंद कर सोचते रहेंगे तो समय तो बरबाद होगा ही तनाव भी हावी हो जाएगा। ऐसी योजना बनाएं कि हर घंटे 50 मिनिट काम करें और 10 मिनिट आराम। इससे थकान नहीं होगी।

कैफीन से बचें:


संभव हो तो कैफीन से बचें। इसकी बजाय दो ग्लास ठंडा पानी हर 30 मिनिट में पीते रहें। ठंडक से आप जागते भी रहेंगे और बार-बार आपको टॉयलेट जाना पड़ेगा। इससे नींद लग जाने से भी बचे रहेंगे।

खिड़की खुली रखें:


काम करते समय कमरे की खिड़की खुली रखें। ठंडी हवा नींद नहीं आने देगी। यदि आपको लगता है कि तरीका सफल हो रहा है तो ठंडे पानी से मुंह धो लें।

मोबाइल-टीवी बंद रखें:


काम पूरा करना है तो मोबाइल, इंटरनेट, टीवी आदि सब बंद करके रखें। कुछ और पढ़ना, लिखना या ड्राइंग करने की न सोचें। इससे आपका ध्यान भंग नहीं होगा।

बिस्तर पर न बैठें:

बिस्तर, सोफे या जमीन पर बैठकर काम न करें। आप ठंडी व सख्त कुर्सी-टेबल पर बैठकर काम करें। इसके अलावा कहीं और बैठकर काम करेंगे तो आपका मन सोने के लिए ललचाएगा। यदि संभव हो तो अपने बेडरूम से दूर रहकर काम करें।

अलार्म लगाकर झपकी लें:

यदि आपको थोड़ी झपकी लेनी है तो अलार्म लगाकर सिर्फ 20 मिनिट के लिए सोएं। अलार्म बजते ही तुरंत उठ जाएं। 5-10 मिनिट और सो लें, जैसा विचार मन में न लाएं। सोने से पहले लाइट जलाकर रखें, क्योंकि अंधेरे में उठने का मन नहीं होगा।
    ( दैनिक  भास्कर )

  


बैंकों में बूम     बैंकों में बूम     बैंकों में बूम

 

बैंकों में बूम इन दिनों भारतीेय  बैंकिंग सेक्टर में नौकरियां ही नौकरियां हैं। देश के सबसे बडे बैंक भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने वर्ष 2010  में 27  हजार कर्मियों की भर्ती करने की योजना बनाई है, जिसके तहत उसने हाल ही में 4,500  प्रोबेशनरी ऑफिसर (पीओ) के लिए आवेदन आमंत्रित किया है। खास बात यह है कि एसबीआई ने पिछले ही साल 25 हजार लोगों को नौकरी दी थी। इसके अलावा कुछ माह पूर्व ही एसबीआई एसोसिएट्स बैंकों में पीओ के लगभग 1700  पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे। इतना ही नहीं, सार्वजनिक क्षेत्र के अन्य बैंकों ने भी नौकरियों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं। एसबीआई लाइफ की भी इस वर्ष 13,000  एजेंट और 200 सेल्स मैनेजरों की भर्ती करने की योजना है। देश की प्रमुख सार्वजनिक बैंकों के अलावा निजी क्षेत्र के बैंक भी भविष्य में नियुक्तियां कर सकते हैं।
बोलते आंकडे
हाल ही में आई मैकिंजी की इंडिया बैंकिंग 2010  रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2001  से भारतीय बैंकिंग सेक्टर 51 प्रतिशत संयोजित वार्षिक दर आगे बढ रहा है, जबकि मार्के ट इंडेक्स 27  प्रतिशत की औसत दर से विकास कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार कुल जीडीपी  में बैंकिंग सेक्टर की हिस्सेदारी 7.7  प्रतिशत से अधिक की होगी और बाजार पूंजीकरण लगभग 7,500  अरब रुपये का हो जाएगा। बैंकिंग सेक्टर के ग्रोथ को देखते हुए माना जा रहा है कि आने वाले समय में 15  लाख लोगों को नौकरी मिल सकती है। पिछले ही साल देश में सरकारी बैंकों में 50,000  से अधिक लोगों को नौकरी मिली है, जिसमें एसबीआई में 11,000  क्लर्को की भर्ती भी शामिल है।
पसंदीदा करियर
सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में बैंकिंग हमेशा से ही युवाओं का पसंदीदा क्षेत्र रहा है। जब कम पदों के लिए परीक्षाएं आयोजित होती थीं, तब भी युवाओं में इसका खासा क्रेज था। वर्तमान समय में तो बैंकिंग सेक्टर में पदों की संख्या के लिहाज से काफी ज्यादा है। बैंकिंग सेक्टर में कई पदों के लिए भर्तियां होती हैं, जिनमें से प्रोबेशनरी  ऑफिसर, स्पेशलिस्ट ऑफिसर्स  एवं क्लर्क के पद प्रमुख हैं। अभ्यर्थी पीओ में भर्ती के बाद शुरू में प्रशिक्षु अधिकारी के रूप में कार्य करता है, लेकिन कुछ ही समय में वह शाखा प्रबंधक बन सकता है। आगे चलकर जनरल मैनेजर, एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर या बैंक का चेयरमैन भी हो सकता है।
वेतन-भत्तों का आकर्षण
शुरू से ही बैंक के वेतन और भत्ते युवाओं के आकर्षण का केंद्र रहे हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में प्रोबेशनरी  ऑफिसर का वेतनमान 10,000-18,240  रुपये होता है और कमोबेश स्पेशलिस्ट ऑफिसर्स का वेतनमान भी पीओ के समान है। वहीं क्लर्क का वेतनमान 4,410-13,210  रुपये है। इसके अलावा कई तरह के भत्ते भी मिलते हैं।
बूम  की वजह
सभी बैंक अपनी गतिविधियों में विविधता ला रहे हैं। वे नई-नई सेवाओं की शुरुआत कर रहे हैं, जैसे- क्रेडिट कार्ड, कंज्यूमर फाइनेंस, वेल्थ मैनेजमेंट, लाइफ व जनरल इंश्योरेंस, इन्वेस्टमेंट बैंकिंग, म्यूचुअल फंड्स, पेंशन फंड रेग्युलेशन, स्टॉक ब्रोकिंग सेवाएं, प्राइवेट इक्विटी आदि। इन सेवाओं के सुचारु संचालन के लिए भी लोगों की आवश्यकता बढ गई है। वर्ष 2002 में बैंकिंग सेवा भर्ती बोर्ड (बीएसआरबी) के भंग होने के बाद एक तरह से बैंकिंग सेक्टर में नई नियुक्तियों पर विराम सा लग गया। इसी दौरान वॉलंटरी रिटायरमेंट स्कीम (वीआरएस) को बैंकों में मंजूरी मिलने के बाद भी रिक्त पदों की संख्या बढ गई। इसके अलावा वित्तीय समायोजन के लिए सभी बैंकों को अपनी शाखाएं बढाने की आवश्यकता है। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र में अपनी गतिविधियों के विस्तार के लिए भी यहां लोगों की आवश्यकता है। कुछ माह पूर्व ही देश के सबसे बडे बैंक भारतीय स्टेट बैंक ने अपनी शाखाओं की संख्या दस हजार तक पहुंचा दी। एसबीआई ने नए केंद्रों पर अपनी उपस्थिति बढाने के लिए इस साल एक हजार नई शाखाएं खोलने की योजना बनाई है। इससे बैंक की शाखाओं की कुल संख्या बढकर 13,000  हो जाएगी। इसके अलावा अपने एटीएम की चालू वित्त वर्ष के अंत तक संख्या बढाकर 25,000  करने का लक्ष्य रखा है।
जॉब की बहार लाने वाले बैंक
वैसे तो देश में जॉब उपलब्ध कराने वाले बैंकों में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अग्रणी हैं, पर निजी बैंक भी आकर्षक पैकेज पर भर्तियां करने में पीछे नहीं हैं :
एसबीआई एवं असोसिएट बैंक
इसमें भारतीय स्टेट बैंक व उनके सात सहयोगी बैंक शामिल हैं। सहयोगी बैंक हैं- स्टेट बैंक ऑफ इंदौर, स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद, स्टेट बैंक ऑफ पटियाला, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ सौराष्ट्र, स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर व जयपुर एवं स्टेट बैंक ऑफ त्रावनकोर।
अन्य नेशनलाइज्ड बैंक
इसमें कुल 19 बैंक हैं। इलाहाबाद बैंक, आंध्रा बैंक, बैंक ऑफ बडौदा, बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ महाराष्ट्र, केनरा बैंक, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, कॉर्पोरेशन बैंक, देना बैंक, इंडियन बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, पंजाब ऐंड सिंध बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, सिंडिकेट बैंक, यूको बैंक, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया व विजया बैंक।
अन्य स्वायत्तशासी बैंक
आईडीबीआई बैंक लिमिटेड।
निजी व विदेशी बैंक
देश में कुल 27 निजी क्षेत्र के बैंक तथा कई विदेशी बैंक हैं। निजी बैंक- आईसीआईसीआई बैंक, एचडीएफसी बैंक आदि। विदेशी बैंक-सिटी बैंक, एचएसबीसी आदि।
ग्रामीण व कोऑपरेटिव बैंक
इसमें अधिकांश बैंक केंद्र सरकार व राज्य सरकार के कोऑपरेटिव बैंक होते हैं, जबकि ग्रामीण बैंक नेशनलाइज्ड बैंकों के ही होते हैं।
जोश डेस्क 
दैनिक जागरण